अंगूर (Grapes) एक अत्यंत लोकप्रिय और पोषक फल है, जो दुनिया भर में खाया जाता है।
यह विटामिन, मिनरल, और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होता है और ताज़ा फल, जूस, किशमिश, वाइन, सिरका और जैली के रूप में उपयोग किया जाता है। अंगूर की खेती गर्म और समशीतोष्ण जलवायु में आसानी से होती है, और भारत में यह महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और पंजाब में अधिक मात्रा में होती है।
1. टेबल अंगूर (Table Grapes)
- थॉम्पसन सीडलैस (Thompson Seedless) – बिना बीज वाला, मीठा, हरे रंग का।
- अनाब-ए-शाही (Anab-e-Shahi) – बड़े दाने, हल्के हरे रंग के, मिठास अच्छी।
- अर्रा-15 / अर्रा-19 – आधुनिक किस्म, लंबी शेल्फ लाइफ, एक्सपोर्ट क्वालिटी।
- पुसा सीडलैस – जल्दी पकने वाली, हल्के हरे रंग के दाने।
- शारद सीडलैस – सफेद रंग के दाने, पतली छाल, अच्छी मिठास।
2. किशमिश बनाने के लिए अंगूर (Raisin Grapes)
- सोनाका (Sonaka) – लंबे, पतले दाने, जल्दी सूखने वाले।
- मैनका (Manaka) – हल्के हरे दाने, अधिक मिठास।
- सूंडा सीडलैस (Sunda Seedless) – बड़े गुच्छे, अच्छी प्रोसेसिंग क्वालिटी।
3. वाइन बनाने के लिए अंगूर (Wine Grapes)
- कैबर्नेट सौविग्नन (Cabernet Sauvignon) – गहरे लाल रंग के, भारी स्वाद।
- शिराज / सिराह (Shiraz / Syrah) – लाल वाइन के लिए लोकप्रिय।
- पिनोट नॉयर (Pinot Noir) – महंगी वाइन बनाने के लिए।
- शेनीन ब्लांक (Chenin Blanc) – सफेद वाइन के लिए उपयुक्त।
4. जूस और प्रोसेसिंग के लिए अंगूर (Juice & Processing Grapes)
- बैंगलोर ब्लू (Bangalore Blue) – गहरे नीले रंग के, जूस व जैम के लिए बढ़िया।
- कन्कोर्ड (Concord) – गहरे बैंगनी, गंध व स्वाद खास।
- इसाबेला (Isabella) – सुगंधित, गहरे बैंगनी रंग के, जूस और जैम में उपयोगी।
जलवायु और मिट्टी
1. जलवायु (Climate)
- उपयुक्त क्षेत्र: अंगूर की खेती उष्णकटिबंधीय और उप-उष्णकटिबंधीय जलवायु में सफल होती है।
- तापमान सीमा:
- आदर्श तापमान: 15°C से 35°C
- 40°C से ऊपर या 10°C से नीचे तापमान लंबे समय तक रहने पर उत्पादन घटता है।
- बारिश:
- कम बारिश वाले क्षेत्र उपयुक्त।
- फूल और फल लगने के समय बारिश होने से फसल को नुकसान (फूल झड़ना, सड़न) हो सकता है।
- धूप:
- अंगूर की अच्छी मिठास और रंग के लिए भरपूर धूप (6–8 घंटे/दिन) जरूरी।
- ठंडी हवाएँ और ओले:
- ओले और तेज हवाओं से बचाना जरूरी, वरना फल झड़ सकते हैं।
2. मिट्टी (Soil)
- प्रकार:
- अच्छी जल निकासी वाली बलुई दोमट या मध्यम दोमट मिट्टी सबसे अच्छी।
- भारी, चिकनी (clay) और पानी भराव वाली भूमि में खेती से बचें।
- pH मान: 6.5 से 7.5 आदर्श।
- 8 से अधिक pH वाली क्षारीय मिट्टी उपयुक्त नहीं।
- गहराई:
- मिट्टी की गहराई कम से कम 1–1.5 मीटर होनी चाहिए, ताकि जड़ों को फैलने की जगह मिले।
- जैविक पदार्थ:
- मिट्टी में 1% से अधिक जैविक कार्बन (Organic Carbon) अच्छा माना जाता है।
- गोबर की सड़ी हुई खाद और हरी खाद डालकर उपजाऊपन बढ़ाएं।
1. खेत की तैयारी (Field Preparation)
(क) जुताई और सफाई
- गर्मी में 1–2 गहरी जुताई मोल्ड-बोर्ड हल या ट्रैक्टर से करें।
- इसके बाद 2–3 बार देशी हल या रोटावेटर से जुताई करें ताकि मिट्टी भुरभुरी हो जाए।
- खेत से खरपतवार, पत्थर और पुरानी जड़ों को हटा दें।
(ख) खाद डालना
- आखिरी जुताई के समय 25–30 टन सड़ी हुई गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर डालें।
- जहां मिट्टी में जैविक पदार्थ कम हो, वहां हरी खाद (Green Manure) भी डालें।
(ग) जल निकासी की व्यवस्था
- अंगूर की जड़ों में पानी भराव से सड़न होती है, इसलिए उँचाई पर क्यारी/बेड बनाएं।
- खेत में नालियां बनाकर अतिरिक्त पानी बाहर निकालने का प्रबंध करें।
(घ) गड्ढे या खाई बनाना
- गड्ढा पद्धति:
- 60cm × 60cm × 60cm आकार के गड्ढे 2–3 मीटर की दूरी पर खोदें।
- गड्ढों में ऊपर की मिट्टी + गोबर की खाद + 50g मेटारिजियम या ट्राइकोडर्मा मिलाकर भरें।
- खाई पद्धति (Trench Method):
- 60cm चौड़ी और 60cm गहरी खाई बनाकर उसमें खाद और मिट्टी भरें।
2. रोपाई (Planting)
(क) सही समय
- उत्तर भारत: फरवरी–मार्च
- दक्षिण भारत: जून–जुलाई या अक्टूबर–नवंबर
- बरसात में रोपाई न करें, क्योंकि अधिक नमी से पौधे सड़ सकते हैं।
(ख) पौधे का चयन
- स्वस्थ, रोगमुक्त, 8–10 महीने पुराने ग्राफ्टेड या कटिंग से तैयार पौधे लें।
- अच्छी पैदावार के लिए प्रमाणित नर्सरी से पौधे खरीदें।
(ग) फासला
- टेबल अंगूर: 3m × 3m
- वाइन अंगूर: 2m × 2m
- किशमिश अंगूर: 2.5m × 2m
(घ) रोपाई की विधि
- गड्ढे या खाई में पानी दें और नमी बना लें।
- पौधा लगाकर जड़ों को हल्की मिट्टी से ढकें।
- पौधे के पास सहारा (बांस या लोहे की रॉड) लगाएं।
- रोपाई के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करें।
सिंचाई प्रबंधन (Irrigation Management)
(क) उपयुक्त सिंचाई प्रणाली
- ड्रिप सिंचाई (Drip Irrigation) अंगूर के लिए सबसे बेहतर है।
- पानी की बचत (40–60%)
- उर्वरक सीधे जड़ों तक पहुँचाना आसान (फर्टिगेशन)
- फ्लड/भराव सिंचाई से बचें, क्योंकि इससे जड़ों में सड़न और रोग लगते हैं।
(ख) सिंचाई का समय और अंतराल
- नए पौधे: 3–4 दिन के अंतराल पर हल्की सिंचाई।
- स्थापित बेलें: मौसम के अनुसार 7–10 दिन पर सिंचाई।
- महत्वपूर्ण अवस्थाएँ (Critical Stages):
- नई कोपल निकलने पर – पौधे की बढ़वार के लिए।
- फूल आने के समय – नमी बनाए रखने के लिए।
- फल बनने और बढ़ने के समय – दाने का आकार और मिठास बढ़ाने के लिए।
- कटाई से 10–12 दिन पहले सिंचाई बंद कर दें, ताकि मिठास और स्वाद बढ़े।
2. खाद एवं उर्वरक प्रबंधन (Manure & Fertilizer Management)
(क) जैविक खाद
- सड़ी हुई गोबर की खाद: 25–30 टन प्रति हेक्टेयर (रोपाई से पहले खेत में मिलाएं)।
- वर्मी कम्पोस्ट: 5–6 टन प्रति हेक्टेयर।
- हरी खाद (जैसे ढैंचा, सनहेम्प) रोपाई से 2–3 महीने पहले बोकर मिट्टी में पलट दें।
(ख) रासायनिक उर्वरक – वार्षिक खुराक (प्रति पौधा)
यह खुराक किस्म, उम्र और उत्पादन क्षमता के अनुसार बदल सकती है।
- नाइट्रोजन (N): 500–700 ग्राम
- फास्फोरस (P₂O₅): 200–300 ग्राम
- पोटाश (K₂O): 500–700 ग्राम
खुराक देने का समय:
- छंटाई के बाद – कुल खुराक का 40%
- फूल आने से पहले – कुल खुराक का 30%
- फल बढ़ने के समय – कुल खुराक का 30%
(ग) सूक्ष्म पोषक तत्व (Micronutrients)
- जिंक सल्फेट (ZnSO₄): 5g/L पानी में घोलकर स्प्रे।
- बोरॉन (Borax): 1g/L पानी में फूल आने से पहले स्प्रे।
- मैग्नीशियम सल्फेट (MgSO₄): 5g/L पानी में फल बनने के समय स्प्रे।
अंगूर की प्रमुख अच्छी किस्में (Good Grape Varieties in India)
भारत में कई अंगूर की किस्में उगाई जाती हैं, पर केवल कुछ ही व्यापक रूप से कमर्शियल खेती में लोकप्रिय हैं। नीचे वे किस्में दी जा रही हैं:
वाणिज्यिक रूप से उगाई जाने वाली किस्में:
- थॉम्पसन सीडलैस (Thompson Seedless / Sultana)
- सबसे व्यापक रूप से उगाई जाने वाली किस्म, लगभग 79% क्षेत्र पर कब्जा टेबल ग्रेप और किशमिश दोनों में उपयोग होती है; मध्यम-मीठा, 20–22% TSS (Total Soluble Solids)
- Tas-e-Ganesh, 2A-Clone, Sharad Seedless प्रतियां
- क्रमशः लगभग 4–5% क्षेत्र पर उगाई जाती हैं
अन्य लोकप्रिय किस्में:
- Anab-e-Shahi
- लंबे, हल्के रंग के दाने; 35 t/ha तक पैदावार
- Table purpose
- Bangalore Blue
- गहरे बैंगनी, छोटे आकार के, जीआई टैग प्राप्त
- रस, जैम, जूस, वाइन में उपयोग
- Gulabi Muscat (Pink Muscat)
- गुलाबी-हरा रंग, सूक्ष्म सुगंधित; थानी, डिंडीगुल (तमिलनाडु) प्रमुख क्षेत्र
- Crimson Seedless
- बड़े, लाल, बिना बीज वाले; स्नैक्स के लिए बहुत लोकप्रिय
- Red Globe
- बड़े लाल (seeded), टेबल और जूस दोनों में लोकप्रिय
- Sharad Seedless
- काले/बैंगनी बिना बीज वाले; विटामिन में समृद्ध; आयात और घरेलू दोनों में मांग
- अन्य किस्में: Dilkhush (Anab clone), Pusa Seedless, Perlette, Bhokri, Gulabi, Hybrids (Arka Vati, Arka Kanchan, Arka Soma आदि) जिनकी पैदावार 30–40 t/ha तक हो सकती है
अंगूर की छंटाई और देखभाल (Pruning & Care in Grape Farming)
अंगूर की अच्छी पैदावार के लिए छंटाई (Pruning) और देखभाल सबसे महत्वपूर्ण कार्य हैं। सही समय और सही तरीके से की गई छंटाई न केवल पैदावार बढ़ाती है, बल्कि फलों की गुणवत्ता भी सुधारती है।
1. छंटाई का महत्व
- अत्यधिक शाखाओं को हटाना ताकि पौधे की ऊर्जा फल उत्पादन में जाए, न कि पत्तियों और लकड़ी में।
- सूरज की रोशनी और हवा का बेहतर प्रवेश, जिससे रोग और कीट का खतरा कम हो।
- नई फलदार टहनियों का विकास होता है।
- आकार और ऊँचाई को नियंत्रित कर पत्तियों की भीड़ से बचाव।
2. छंटाई का सही समय
- उत्तर भारत – पत्ते गिरने के बाद दिसंबर–जनवरी में।
- महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश – दो बार छंटाई की जाती है:
- अप्रैल–मई (समर प्रूनिंग) – नई लताएं बनाने और संरचना तैयार करने के लिए।
- सितंबर–अक्टूबर (विंटर प्रूनिंग) – फल आने वाली टहनियों को बढ़ावा देने के लिए।
3. छंटाई की विधियाँ
- हेड सिस्टम
- छोटे बागानों और कमजोर किस्मों के लिए।
- मुख्य तने से छोटी-छोटी फलदार शाखाएं रखी जाती हैं।
- कॉर्डन सिस्टम
- बड़े बागानों में, एक या दो मुख्य बाँहें (arms) बनाकर उनसे फलदार टहनियां निकलने दी जाती हैं।
- बिलेट्रल/यूनिलेट्रल सिस्टम
- एक तरफ या दोनों तरफ फैली हुई बाँहें; रोशनी और हवा के अच्छे प्रवेश के लिए।
4. छंटाई के दौरान ध्यान देने योग्य बातें
- पुरानी, सूखी, रोगग्रस्त शाखाएं हटा दें।
- फल देने वाली टहनियों की लंबाई 6–8 आँखें (buds) तक रखें।
- पौधों के बीच की दूरी में रोशनी और हवा का प्रवेश बना रहे।
- छंटाई के बाद बोर्डो पेस्ट या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का लेप कटे हिस्सों पर लगाएँ ताकि संक्रमण न हो।
5. छंटाई के बाद देखभाल
- सिंचाई – छंटाई के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करें, अत्यधिक पानी से बचें।
- खाद और पोषण – नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश और सूक्ष्म पोषक तत्वों का संतुलित उपयोग करें।
- रोग नियंत्रण – पाउडरी मिल्ड्यू, डाउनरी मिल्ड्यू और एन्थ्रेक्नोज के लिए समय पर स्प्रे।
- मल्चिंग – नमी बनाए रखने और खरपतवार कम करने के लिए।
सही समय का चयन
- अंगूर की कलमें बनाने का सबसे अच्छा समय दिसंबर से जनवरी के बीच होता है, जब पौधा सुप्त अवस्था (Dormant stage) में होता है।
- इस समय पौधे में रस का प्रवाह कम होता है और जड़ों के बनने की संभावना अधिक रहती है।
2. मातृ पौधे का चयन (Selection of Mother Plant)
- स्वस्थ, रोग-मुक्त और अधिक उत्पादन देने वाले पौधे चुनें।
- चुनी गई बेल में फल की गुणवत्ता, आकार और स्वाद उत्तम होना चाहिए।
- पौधे की उम्र 2–5 साल के बीच होनी चाहिए।
3. कलम के लिए टहनी का चयन (Selection of Cane for Cuttings)
- 1 साल पुरानी, पकी हुई, मोटी और भूरे रंग की टहनियाँ लें।
- टहनी पर अच्छी तरह विकसित कली (Bud) होनी चाहिए।
- कमजोर, रोगग्रस्त या बहुत पतली टहनियाँ न लें।
4. कलम की लंबाई और कटाई (Cutting & Size)
- कलम की लंबाई: 20–25 सेमी (8–10 इंच)
- मोटाई: पेंसिल जितनी (लगभग 0.8–1.2 सेमी)
- प्रत्येक कलम में 3–4 स्वस्थ कलियाँ होनी चाहिए।
- नीचे का कट कली के ठीक नीचे और ऊपर का कट कली से 2–3 सेमी ऊपर लगाएँ।
- कटाई करते समय धारदार कैंची या चाकू का प्रयोग करें ताकि छाल न फटे।
5. कलम की तैयारी (Preparation of Cuttings)
- नीचे का हिस्सा तिरछा (Slanting) काटें और ऊपर का हिस्सा सीधा रखें ताकि रोपाई के समय दिशा न बदले।
- निचले हिस्से को रूटिंग हार्मोन (IBA – Indole Butyric Acid 2000 ppm) में 5–10 सेकंड डुबोएँ, जिससे जड़ें जल्दी निकलें।
- कटिंग को 24 घंटे पानी में भिगोना भी जड़ बनने में मदद करता है।
6. कलम रोपाई की जगह की तैयारी (Bed Preparation)
- रेतीली दोमट मिट्टी वाली नर्सरी तैयार करें।
- मिट्टी में अच्छी निकासी व्यवस्था होनी चाहिए।
- मिट्टी को 0.5% फॉर्मेलिन या नीम खली मिलाकर रोगाणु मुक्त करें।
- रोपाई के लिए 15×15 सेमी की दूरी रखें।
7. कलम रोपाई की प्रक्रिया (Planting Process)
- कलम का 2/3 हिस्सा मिट्टी में दबाएँ और 1/3 हिस्सा ऊपर रखें।
- रोपाई के बाद हल्की सिंचाई करें।
- कलम की कली ऊपर की ओर होनी चाहिए, उल्टा न लगाएँ।
- नमी बनाए रखने के लिए मल्चिंग करें।
8. देखभाल (Care of Cuttings)
- रोज हल्की सिंचाई करें, लेकिन पानी जमा न होने दें।
- खरपतवार समय-समय पर निकालें।
- पौधों को धूप से बचाने के लिए शेड नेट लगाएँ।
- यदि कलियों से नई कोमल टहनियाँ निकलें तो उन्हें कीट और रोग से बचाएँ।
9. जड़ निकलने और पौधा तैयार होने का समय
- 3–4 हफ्तों में जड़ें निकलने लगती हैं।
- लगभग 2–3 महीने में कलम पूरी तरह पौधा बन जाता है।
- पौधे को मुख्य खेत में लगाने से पहले उसकी ऊँचाई 30–40 सेमी और जड़ें अच्छी तरह विकसित होनी चाहिए।
10. मुख्य खेत में रोपाई
- कलम से तैयार पौधे को खेत में लगाने का सबसे अच्छा समय फरवरी–मार्च है।
- रोपाई से पहले जड़ों को 0.2% कार्बेन्डाजिम घोल में 5–10 मिनट डुबोएँ ताकि रोग न लगें।
कीट और रोग
कीट (Insect Pests) – 25 प्रकार
- अंगूर का फली छेदक (Grapevine borer)
- अंगूर पत्ती लपेटक (Leaf folder)
- अंगूर का मिली बग (Mealy bug)
- अंगूर का थ्रिप्स (Thrips)
- अंगूर का माइट (Mites)
- अंगूर का वाइन हॉपर (Grape vine hopper)
- अंगूर का स्टेम बोरर (Stem borer)
- अंगूर का फ्रूट फ्लाई (Fruit fly)
- अंगूर का वाइन स्केल (Vine scale insect)
- अंगूर का बड माइट (Bud mite)
- अंगूर का व्हाइट फ्लाई (White fly)
- अंगूर का कटवर्म (Cutworm)
- अंगूर का लीफ माइनर (Leaf miner)
- अंगूर का स्किन बग (Skin bug)
- अंगूर का एफिड (Aphid)
- अंगूर का लूपर कैटरपिलर (Looper caterpillar)
- अंगूर का शूटर बग (Leaf hopper)
- अंगूर का कोचीनियल स्केल (Cochineal scale)
- अंगूर का बड वर्म (Bud worm)
- अंगूर का पिंक बोरर (Pink borer)
- अंगूर का टर्माइट (Termite)
- अंगूर का कैरब बीटल (Carab beetle)
- अंगूर का फोलिएज बीटल (Foliage beetle)
- अंगूर का नाक्सियस वाइन वीविल (Noxious vine weevil)
- अंगूर का ग्रीन हॉपर (Green hopper)
B. रोग (Diseases) – 25 प्रकार
- पाउडरी मिल्ड्यू (Powdery mildew)
- डाउनरी मिल्ड्यू (Downy mildew)
- एन्थ्रेक्नोज (Anthracnose)
- ब्लैक रॉट (Black rot)
- बोट्रीटिस बंच रॉट (Botrytis bunch rot)
- डेड आर्म डिजीज (Dead arm disease)
- ग्रेपवाइन येलो (Grapevine yellows)
- एस्का डिजीज (Esca disease)
- पियर्स डिजीज (Pierce's disease)
- अल्टरनेरिया लीफ स्पॉट (Alternaria leaf spot)
- लीफ ब्लाइट (Leaf blight)
- वर्टिसिलियम विल्ट (Verticillium wilt)
- फ्यूजेरियम विल्ट (Fusarium wilt)
- डाइबैक डिजीज (Dieback disease)
- बैक्टीरियल ब्लाइट (Bacterial blight)
- रस्ट डिजीज (Rust disease)
- ग्रेपवाइन फैनलीफ वायरस (Grapevine fanleaf virus)
- ग्रेपवाइन लीफरोल वायरस (Grapevine leafroll virus)
- ग्रेपवाइन मोज़ेक वायरस (Grapevine mosaic virus)
- पेटियोल ब्लाइट (Petiole blight)
- नेक रॉट (Neck rot)
- बैक्टीरियल कैंकर (Bacterial canker)
- ग्रेपवाइन स्टंट डिजीज (Grapevine stunt disease)
- पिंक डिजीज (Pink disease)
- क्राउन गॉल (Crown gall)
कीट नियंत्रण (Insect Pest Management)
A. सांस्कृतिक एवं यांत्रिक उपाय (Cultural & Mechanical Methods)
· समय-समय पर बगीचे की छंटाई और सफाई करें।
· रोगग्रस्त और कीट-ग्रस्त पत्तियां/फलों को तोड़कर नष्ट करें।
· खेत में खरपतवार न बढ़ने दें।
· पीली चिपचिपी ट्रैप (Yellow sticky traps) और फेरोमोन ट्रैप लगाएँ।
· पौधों के बीच पर्याप्त हवा और रोशनी का प्रवेश रखें।
B. जैविक नियंत्रण (Organic/Biological Control)
· नीम तेल 5 मिली/लीटर पानी का छिड़काव थ्रिप्स, मिलीबग और एफिड के लिए।
· ट्राइकोग्रामा, क्रिप्टोलैमस और लेडीबर्ड बीटल जैसे परभक्षी कीट छोड़ें।
· बायो-कीटनाशक जैसे Beauveria bassiana, Verticillium lecanii का प्रयोग।
C. रासायनिक नियंत्रण (Chemical Control)
· मिलीबग: बुप्रोफेज़िन 25% SC – 1 मिली/लीटर पानी
· थ्रिप्स: स्पिनोसेड 45% SC – 0.3 मिली/लीटर पानी
· माइट: प्रोपरगाइट 57% EC – 1 मिली/लीटर पानी
· हॉपर/एफिड: इमिडाक्लोप्रिड 17.8% SL – 0.3 मिली/लीटर पानी
2. रोग नियंत्रण (Disease Management)
A. पाउडरी मिल्ड्यू
· लक्षण: पत्तियों, टहनियों और फलों पर सफेद पाउडर जैसी परत।
· नियंत्रण:
o गंधक पाउडर (Sulphur) – 3 ग्राम/लीटर पानी का छिड़काव।
o ट्रायडिमेफॉन 25% WP – 0.5 ग्राम/लीटर पानी।
B. डाउनरी मिल्ड्यू
· लक्षण: पत्तियों के ऊपर पीले धब्बे, नीचे सफेद फफूंदी।
· नियंत्रण:
o बोर्डो मिश्रण (1%) का छिड़काव।
o मेटालेक्सिल + मैंकोजेब – 2 ग्राम/लीटर पानी।
C. एन्थ्रेक्नोज
· लक्षण: पत्तियों और फलों पर काले गड्ढेदार धब्बे।
· नियंत्रण:
o मैंकोजेब 2 ग्राम/लीटर पानी।
o कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 3 ग्राम/लीटर पानी।
D. बोट्रीटिस बंच रॉट
· लक्षण: फलों का नरम होना, धूसर रंग की फफूंदी।
· नियंत्रण:
o कार्बेन्डाजिम 1 ग्राम/लीटर पानी।
o इप्रोडियोन 1.5 ग्राम/लीटर पानी।
3. समन्वित रोग-कीट प्रबंधन (IPDM) के सुझाव
· रोग और कीट का पहचान होते ही उपचार करें, देर न करें।
· रासायनिक और जैविक नियंत्रण का मिश्रित उपयोग करें, ताकि कीटों में प्रतिरोधक क्षमता न बढ़े।
· संतुलित उर्वरक दें, नाइट्रोजन की अधिकता से कीट और रोग बढ़ सकते हैं।
· फसल चक्र (Crop rotation) और स्वच्छता पर ध्यान दें।
· सिंचाई नियंत्रित करें – अधिक नमी कई रोगों को बढ़ावा देती है।
फसल कटाई का समय (Harvesting Time)
- अंगूर की कटाई किस्म, जलवायु और खेती के क्षेत्र पर निर्भर करती है।
- फूल आने के 120–150 दिन बाद फल पकने लगते हैं।
- कटाई का सही समय:
- दाने का रंग पूरी तरह बदल जाए (हरी किस्म में हल्का पीला, काली किस्म में गहरा बैंगनी)।
- स्वाद में मिठास आ जाए और दाने का खट्टापन खत्म हो जाए।
- दाने का TSS (Total Soluble Solids) स्तर 16–20° Brix तक पहुँचना चाहिए (गुड़ता और मिठास मापने के लिए)।
- डंठल हरा और लचीला होना चाहिए, सूखा नहीं।
2. कटाई की विधि (Harvesting Method)
- सुबह या शाम के समय कटाई करें ताकि फल की नमी और ताजगी बनी रहे।
- साफ और तेज कैंची/प्रूनर का प्रयोग करें।
- गुच्छों को सावधानी से पकड़कर काटें, ताकि दाने न टूटें।
- कटाई के बाद गुच्छों को छाया में रखें और सीधी धूप से बचाएँ।
3. फसल की सफाई और ग्रेडिंग (Cleaning & Grading)
- खराब, सड़े या फटे हुए दाने हटा दें।
- गुच्छों को आकार और रंग के आधार पर ग्रेड करें –
- A ग्रेड: बड़े, समान आकार के दाने, चमकदार रंग
- B ग्रेड: सामान्य आकार, हल्के दाग
- C ग्रेड: छोटे, असमान दाने, बाजार में कम दाम
4. पैकिंग और भंडारण (Packing & Storage)
- पैकिंग के लिए कार्टन बॉक्स या प्लास्टिक क्रेट का उपयोग करें।
- बॉक्स के अंदर पेपर पैडिंग या थर्मोकोल शीट लगाएँ।
- लंबे समय तक भंडारण के लिए कोल्ड स्टोरेज (0–1°C तापमान और 90–95% आर्द्रता) का उपयोग करें।
- इस स्थिति में अंगूर 4–6 सप्ताह तक ताजा रह सकते हैं।
5. औसत उत्पादन (Average Yield)
- अच्छी देखभाल और प्रबंधन से प्रति हेक्टेयर औसत उत्पादन:
- थॉम्पसन सीडलैस: 20–25 टन/हेक्टेयर
- अनाब-ए-शाही: 25–30 टन/हेक्टेयर
- बैंगलोर ब्लैक: 15–20 टन/हेक्टेयर
- रेड ग्लोब: 18–22 टन/हेक्टेयर
- ड्रिप सिंचाई, उचित खाद, कीट/रोग नियंत्रण और सही कटाई समय से उत्पादन और गुणवत्ता दोनों बढ़ते हैं।
6. कटाई के बाद विपणन (Post-harvest Marketing)
- स्थानीय मंडी – तुरंत बिक्री के लिए
- थोक व्यापारी/निर्यातक – उच्च गुणवत्ता वाले अंगूर के लिए
- किशमिश उत्पादन – अधिक मिठास वाली किस्मों का उपयोग
- जूस, वाइन और जैम उद्योग – अतिरिक्त अंगूर का उपयोग
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